छत्‍तीसगढ़ी महाकाव्‍य ( गरीबा ) के प्रथम रचनाकार श्री नूतन प्रसाद शर्मा की अन्‍य रचनाएं पढ़े

सोमवार, 2 जनवरी 2017

रहस्‍योदघाटन

  नूतन प्रसाद


         वेदव्यास भागवत पुराण की रचना कर चुके थे। उन्होंने लिखा कि पक्ष विपक्ष ने मिलकर समुद्र मंथन किया। इसमें अमृत लक्ष्मी,कल्पवृक्ष, मदिरा,ऐरावत अर्थात चौदह रत्न निकले।
       रत्नों की प्र्र्राप्ति हेतु लोगों की भीड़ लग गई। इनमें चिकित्सक, वैज्ञानिक,अभियंता,अर्थशास्त्री,गृहणी सम्मिलित थे। चिकित्सक ने अपनी समस्या रखी - '' गुरू देव, मैं अस्वस्थ लोगों का उपचार करता हूं। रोगों के अनुसार औषधि तय करता हूं। इसमें मैं थकता हूं। समय नष्ट होता है। जो स्वस्थ होता है। वह धन्यवाद देता है। मुझे दूसरा भगवान कहता है। लेकिन किसी की मृत्यु हो गई तो वह मुझे यमदूत कहकर निंदा करता है। कई चिकित्सकों की पिटाई भी हो चुकी है। इस अपयश से बचाने मुझे अमृत दे दीजिये। मैं जीवित प्राणी को पिला दूंगा कि वह अमरत्व प्राप्त कर ले। मृत को पिला दूं तो वह पुन: जीवित हो उठे।''
      व्यास गंभीर हो गये। कहा  - '' मेरे पास अमृत नहीं है। अभी तक ऐसी वस्तु नहीं मिली कि प्राणी उसका सेवन करे और अमरत्व को प्राप्त कर लें।''
     वेदों में अमृत की चर्चा है। हमारे पूर्वजों ने इस पर चिंतन करके वस्तु का आकार दिया। आज भी यह विषस समाज में गति मान है। इसे मैंने भी अपने ग्रंथ में स्थान दिया।
    यद्यपि यह असंभव है कि मृत व्यक्ति का कोई वस्तु दो। वह सेवन करे और तत्काल जीवित हो जाये। मनुष्य की सदा चाहत रही कि अधिकाधिक वर्ष तक निरोग जीवित रहे। अमृत बुद्धिजीवियों की श्रेष्ठ कल्पना है मगर यथार्थ के समीप है ....।
      आप चिकित्सक हैं। औषधियों के ज्ञाता हैं। ऐसा खोज करें कि प्राणी निरोग रहे। औसत से अधिक उम्र तक जीवित रहें। और हां, कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह नहीं निभा सकता। आप अपनी भावी पीढ़ी को भी सचेत कर देना कि वह इस कार्यक्रम को निरंतर आगे बढ़ाये।
     अमृत का गुप्त रहस्य सार्वजनिक हो गया। उस जन समुदाय में गृहणी थी। उसने प्रार्थना की- कवि श्रेष्ठ, मैं परेशान हूं अपने परिवार से -  मैं भोजन पकाती हूं। कोई भाजी मांगता है कोई भिण्डी। एक चांवल - दूसरा पूड़ी। पुत्र मिठाई चाहता है तो पुत्री नमकीन। एक सूखा- दूसरा रसदार ... मुझे आप कल्प वृक्ष दे दीजिये। उसे ले जाकर घर में रोपूंगी। मेरे परिवार के लोग उसके नीचे बैठेंगे। इच्छित वस्तुएं मांग कर खा लेंगे। मुझे भोजन पकाने से मुक्ति मिल जायेगी।
     व्यास हंस पड़े। बोले-  कल्प वृक्ष जैसा कोई वृक्ष नहीं है कि जिसके नीचे बैठकर व्यक्ति इच्छित भोज्य पदार्थ तत्काल प्राप्त कर ले। हम कवि लोग समाज को सुख सुविधायें देने उपयोगी वस्तुओं की कल्पना करते हैं। इस वृक्ष की कल्पना करके हम चाहते हैं कि मांग के अनुरूप वस्तुएं सुलभता और तत्काल प्राप्त हो जाये। साथ ही एक स्थान पर। उस कार्यक्रम की सफलता के लिये तुम्हें उद्यम करना होगा। कभी हो जाये तो अपने वंशज को यह कार्यक्रम सौंप देना।
      जन समुदाय की शंकाओं और प्रश्नों का उत्तर देना अनिवार्य था। व्यास ने निवारण किया- लक्ष्मी का आशय धन दौलत राशि सम्पत्ति से है। इसमें आकर्षण है। मैंने अपने ग्रंथ में देवता और दानव में युद्ध करते दिखाया है। लक्ष्मी समुद्र की पुत्री है। समुद्र को साहित्य में रत्नाकर कहा गया है। वह पूंजीपति है। धरती के अधिकांश भाग पर समुद्र का अधिकार है। धरती के अंदर अनेक रत्न सोना, चांदी, हीरा,खनिज पदार्थ कोयला हैं। उसकी प्राप्ति के लिये युद्ध स्तर पर श्रम करना पड़ता है। आज भी लक्ष्मी प्राप्ति के लिये युद्ध होता है। युद्ध करना पड़ेगा।
      द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा दूध के लिये रोने लगा। तब द्रोणाचार्य ने चांवल को पीस कर उसे पानी से घोल बनाया। वह सफेद था। उसे अश्वत्थामा ने हर्षित होकर दूध समझ कर पी लिया। इसका अर्थ यह हुआ कि दूध की कमी थी ... मगर हम कवियों - बुद्धिजीवियों ने क्षीर सागर दूध का सागर की बात कही। यह असम्भव है। लेकिन इसका उद्देश्य यह है कि पर्याप्त मात्रा में दूध या शक्ति वर्धक वस्तु मिल जाये। अभाव की पूर्ति के लिये उपाय ढ़ूंढ़ना आवश्यक है।
     वेद व्यास के कल्प वृक्ष की कल्पना का शानदार असर हुआ- पहले लकड़ियां जलाकर भोजन पकाया जाता है। आज गैस है। होटल-  रेस्टोरेंट माल स्टार होटलों में इच्छित वस्तु तत्काल उपलब्ध हो जाती है।
      क्षीर सागर से यह विकास हुआ कि पहले प्रत्येक घर में गाय भैंस बकरी पालते थे। आज डेयरी से हर समय दूध और उससे बनी सामाग्री तत्काल मिल जाती है।
     समुद्र से ऐरावत हाथी - उच्चैश्रवा अश्व नामक वाहन निकला। वह समुद्र के जल से बाहर निकला है। पृथ्वी पर भी चलता है। इसका विकास यह हुआ कि पनडुब्बी जहाज आया। वायु यान पृथ्वी पर दौड़ कर आकाश में उड़ता है। फिर पानी में उतर कर उसमें भी रफ्तार से तैरता है। अब तो समुद्र में नगर बसने लगे हैं।
     मदिरा के विरूद्ध अत्यधिक प्रचार हुआ है। मगर मदिरा का उपयोग अनुपान अनुसार हो। यह औषधि के क्षेत्र में दखल रखता है। कृष्ण के बड़े भाई बलराम कृषक थे। दिन भर खेतों में श्रम करके थक जाते थे। तो कादम्बिनी के फूल से बने कादम्बरी नामक मदिरा का पान करते। घोर निद्रा में रात्रि विश्राम करते .... हां, अधिक मात्रा का सेवन हानि कारक है। अधिक पौष्टिक भोजन भी स्वास्थ्य का शत्रु है। अति सर्वत्र वर्जयेत।
     वेद व्यास का कार्यक्रम आज भी गति मान है। युग अनुसार समुद्र मंथन की व्याख्या होगी। भावी समाज इससे रत्न प्राप्त करते जायेगा।

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