छत्‍तीसगढ़ी महाकाव्‍य ( गरीबा ) के प्रथम रचनाकार श्री नूतन प्रसाद शर्मा की अन्‍य रचनाएं पढ़े

सोमवार, 2 जनवरी 2017

राष्‍टृधर्म

  नूतन प्रसाद 
     दुशाला कौरव भाइयों की सबसे छोटी बहन थी। वह बड़ी चंचल और हंस मुख थी। उसके मन में किसी के प्रति भेद नहीं था। वह पाण्डवों को भी भैया शब्द से संबोधित करती थी।
    रक्षा बंधन का पवित्र पर्व आया। दुशाला ने थाली में कुंकुम नारियल मिठाई और राखी रखा। भाइयों को राखी बांधने निकली। आगे में दुर्योधन और दुशासन बैठे थे। दुशाला ने कौरव भाइयों को देखा पर उन्हें लांघ कर निकलने लगी। दुर्योधन ने रोका - '' तुम  हमारे हाथों में राखी बांधो। टीका लगाओ। मिठाई खिलाओ। हम तुम्हारी कब से प्रतीक्षा कर रहे हैं।''
    दुशाला ने कहा - '' मैं सर्वप्रथम युधिष्ठिर को राखी बांधूगी। वह परिवार में वरिष्ठ सदस्य है। सम्मानीय हैं।''
    दुशासन ने कहा - '' उनके पास मत जाओ। वे हमारे शत्रु हैं। हमारा उनका पारिवारिक संबंध खत्म हो गया है।''
   दुशाला ने कहा - '' तुम लड़ो झगड़ो। शत्रुता रखो। यह उचित भी है। यश पद धन प्राप्ति के लिये युद्ध करना आवश्यक है। मगर मैं कौरवों के साथ साथ पाण्डवों की भी बहन हूं। मुझे तुम्हारी शत्रुता से क्या लेना देना है। मैं सभी भाइयों को राखी बांधूंगी।''
    दुशाला आगे बढ़ गई। वह पाण्डवों के पास गई। युधिष्ठिर ने कहा- '' मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में था। मुझे विश्वास था -  तुम राखी बांधने अवश्य आओगी।''
      दुशाला ने सभी भाइयों को टीका लगाया। मिठाई खिलाई। राखी बांधी। युधिष्ठिर ने कहा - '' आज हम इस पावन पर्व पर अति प्रसन्न हैं। इसमें भाई अपनी बहन को कुछ न कुछ उपहार देता है। तुम्हारी क्या मांग है। हमें बताओ ?''
    दुशाला ने कहा - '' भैया,समस्त संसार में आपकी और कौरवों की शत्रुता की चर्चा है। मैं दोनों पक्षों को युद्ध से नहीं रोक सकती। मगर मेरी सिर्फ एक मांग है।'' भीम ने पूछा - '' वह क्या - स्पष्ट बताओ ?''
    दुशाला ने कहा- '' जब कभी कौरवों पर आक्रमण हो या कष्ट आये आप उनके प्राणों की रक्षा करना।''
    भीम गरज उठा - '' यह हमसे नहीं होगा। कौरव और पाण्डव का सिद्धांत अलग अलग है।''
    दुशाला ने कहा - '' तुम दोनों एक ही परिवार के सदस्य हो। खून एक है। तुममें मतभेद है तो आपस में युद्ध करो। मगर बाह्य शत्रु कौरवों पर आक्रमण करे तो उनकी रक्षा तुम करना।''
    युधिष्ठिर ने दुशाला की प्रशंसा की - '' बहन , तुम उम्र में हमसे छोटी हो मगर तुममें कुशाग्र बुद्धि और समदृष्टि है। हम तुम्हारी बातों का सदा याद रखेंगे - कौरवों पर जब भी विपत्ति आयेगी हम उनकी सहायता करेंगे।''
     दुशाला प्रसन्न मन से विदा हुई। वह कौरवों के पास आई। दुर्योधन ने कहा - '' बड़ी देर कर दी। राखी बांधने के बदले पाण्डव ने क्या उपहार दिया ?''
   दुशाला ने बताया - '' मुझे वचन दिया कि जब भी कौरवों पर विपत्ति आयेगी हम उनकी सहायता करेंगे।''
   दुशासन ने कहा - '' हमें उनकी सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम स्वयं सक्षम हैं। किसी भी आपदा से लोहा लेकर विजय प्राप्त कर लेंगे।''
    दुशाला ने कहा - '' तुम एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़ते रहो। मुझे आज रक्षा बंधन के कार्यक्रम को सौहार्द रूप से निबटाना है।''
     दुशाला ने कौरवों को राखी बांधा।
 कुछ पश्चात शकुनि ने युधिष्ठिर को द्यूत क्रीडा में भाग लेने आमंत्रित किया। वह कौरवों का पक्षधर था। विदुर ने समझाया - '' आप इस क्रीडा से दूर रहें। द्यूत में संचालक या अायोजक की जीत निश्चित है। क्रीडा में भाग लेने वाला कितना भी बुद्धिमान,भविष्यवक्ता और गणितज्ञ हो मगर उसकी हार निश्चित है वर्तमान में सहा और लाटरी की स्वर्ण मृग और द्यूत हैं।
    युधिष्ठिर ने कहा - '' द्यूत भी पक्ष और विपक्ष की क्रीडा है। मुझे प्रतिद्वन्दी ने ललकारा है। मैं वीर हूं। योद्धा हूं। कर्म से क्षत्रिय हूं। मैं आमंत्रण स्वीकार करूंगा। अस्वीकार किया इसका अर्थ मैंने क्रीडा से पूर्ण हार स्वीकार ली।'' 
    द्यूत प्रारंभ हुआ। युधिष्ठिर दांव लगाते गये। बाजी हारते गये। अंत में पत्नी द्रौपदी को भी हार गये। पाण्डवों को राजधानी से निष्कासन का दण्ड मिला। वे इधर उधर घुमक्कड़ी जीवन बिताने लगे। एक दिन उन्हें खबर मिली कि चित्रसेन ने दुर्योधन, शकुनि और कर्ण को बंदी बना लिया है। वह उनकी हत्या करने उधत है। युधिष्ठिर ने कौरवों की रक्षा करने का विचार किया। तभी अर्जुन ने टोंका- '' भैया,दुर्योधन और शकुनि ने हमसे अन्याय पूर्ण व्यवहार किया। उन्होनें षड़यंत्र रचकर हमें द्यूत में हराया। उनके कारण हम अनाथ सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। चित्रसेन ने हमारे शत्रु को बंदी बनाकर अच्छा ही किया है। वह कौरवों की हत्या कर दे तो हमें प्रसन्नता होगी।''
     युधिष्ठिर ने कहा - '' दुशाला ने हमें राखी बांधा है। हमने उसे वचन दिया है कि कौरवों पर विपत्ति के समय उनकी सहायता करेंगे। अभी वक्त आ गया है- बहन को दिया वचन निभायेंगे।''
    पाण्डवों ने चित्रसेन को पराजित किया। कौरवों को उसके बंधन से मुक्त कराया। कौरव सकुशल बच गये मगर उन्होंने पाण्डवों का प्रशंसा नहीं की। अपितु युद्ध भूमि में देख लेना की धमकी दी। वे चले गये। नकुल ने कहा - '' देखा भैया , हमने अपनत्व के भाव से कौरवों के प्राण बचाये लेकिन उनका कटु वचन नहीं गया। अभी भी वे युद्ध करने ललकार रहे हैं।
     युधिष्ठिर ने कहा- '' हम और कौरव एक परिवार के हैं। एक देश के निवासी हैं। हम राजनीतिक पद पाने, आर्थिक लाभ अर्जित करने, यश मान बड़ाई प्राप्ति के लिये युद्ध करेंगे लेकिन अन्य देश का शत्रु हम पर आक्रमण करेगा तो हम पक्ष और विपक्ष में बंटे रहने के बावजूद सब मिलकर बाह्य आक्रमण कारी को खदेड़ कर रहेंगे।''
     भाइयों ने युधिष्ठिर की देश भक्ति से प्रेरित बातों को सुना। वे प्रभावित हुए। युधिष्ठिर के आदर्श वचन आज भी प्रासंगिक हैं। वास्तव में देश सुरक्षित तो हम सब सुरक्षित।

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